Human Trafficking Is The Third Largest Organised Crime Worldwide.

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यह सूचित किया जा है की लेख मे चिन्हित सभी तथ्य और जानकारियाँ पूर्णत इंटरनेट के माध्यम से जुटाई गयी है | मानव तस्करी अपने आप मे एक गहन शोध का विषय है और इसकी गभीरता एक लेख के माध्यम से दर्शाई नहीं जा सकती |

लेख –

नशीली दवाओं और हथियारों के कारोबार के बाद मानव तस्करी विश्व भर में तीसरा सबसे बड़ा संगठित अपराध है।

संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा के अनुसार ‘किसी व्यक्ति को डराकर, बलप्रयोग कर या दोषपूर्ण तरीके से भर्ती, परिवहन या शरण में रखने की गतिविधि तस्करी की श्रेणी में आती है’।

मानव तस्करी भारत की प्रमुख समस्याओं में से एक है। आज तक ऐसा कोई अध्ययन नहीं किया गया जिससे भारत में तस्कर हुए बच्चों का सही आंकड़ा पता चल सके। न्यूयोर्क टाइम्स ने भारत में, खासकर झारखंड में मानव तस्करी की बढ़ती समस्या पर रिपोर्ट दी है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि छोटी उम्र की लड़कियों को नेपाल से तस्करी कर भारत लाया जाता है।

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक अन्य लेख के अनुसार मानव तस्करी के मामले में कर्नाटक भारत में तीसरे नंबर पर आता है। अन्य दक्षिण भारतीय राज्य भी मानव तस्करी के सक्रिय स्थान हैं। चार दक्षिण भारतीय राज्यों में से प्रत्येक में हर साल ऐसे 300 मामले रिपोर्ट होते हैं। जबकि पश्चिम बंगाल और बिहार में हर साल औसतन ऐसे 100 मामले दर्ज होते हैं। आंकड़ों के अनुसार, मानव तस्करी के आधे से ज्यादा मामले इन्हीं राज्यों से हैं।

नशीली दवाओं और अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के द्वारा मानव तस्करी पर जारी एक ताजा रिपोर्ट से पता चलता है कि सन् 2012 में तमिलनाडु में मानव तस्करी के 528 मामले थे। यह वास्तव में एक बड़ा आंकड़ा है और पश्चिम बंगाल, जहां यह आंकड़ा 549 था, को छोड़कर किसी भी अन्य राज्य की तुलना में सबसे अधिक है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार चार सालों में कर्नाटक में मानव तस्करी के 1379 मामले रिपोर्ट हुए, तमिलनाडु में 2244 जबकि आंध्र प्रदेश में मानव तस्करी के 2157 मामले थे। हाल ही में बेंगलुरु में 300 बंधुआ मजदूरों को छुड़ाया गया। फस्र्टपोस्ट के एक लेख के अनुसार दिल्ली भारत में मानव तस्करी का गढ़ है और दुनिया के आधे गुलाम भारत में रहते हैं।

इस स्थिति पर भी मांग और आपूर्ति का सिद्धांत लागू होता है। पुरुष काम करने के लिए बड़े व्यवसायिक शहरों की ओर पलायन करते हैं, जिससे व्यापारिक सेक्स की मांग पैदा होती है। इस मांग को पूरा करने के लिए सप्लायर हर तरह की कोशिश करता है जिसमें अपहरण भी शामिल है। गरीब परिवार की छोटी लड़कियों और युवा महिलाओं पर यह खतरा ज्यादा होता है।

इसके बाद आता है अन्याय और गरीबी। यदि आप भारत के उत्तरपूर्व राज्य के किसी गरीब परिवार में पैदा हुए हैं तो आपके बेचे जाने का खतरा ज्यादा है। यदि आप किसी गरीब परिवार में पैदा हों या लड़की हों तो खतरा और बढ़ जाता है। कभी कभी पैसों की खातिर मां बाप भी बेटियों को बेचने पर आमादा हो जाते हैं।

सामाजिक असमानता, क्षेत्रीय लिंग वरीयता, असंतुलन और भ्रष्टाचार मानव तस्करी के प्रमुख कारण हैं।

आदिवासी क्षेत्रों के मां बाप सोचते हैं कि वे अपने बच्चों को बेचकर उन्हें शिक्षा और सुरक्षा के मायने में बेहतर जीवन दे रहे हैं। मां बाप बच्चों के रहने और खाने के लिए इन एजेंटों को 6000-7000 रुपये तक भी देते हैं।

अनैतिक तस्करी निवारण अधिनियम के तहत व्यवसायिक यौन शोषण दंडनीय है। इसकी सजा सात साल से लेकर आजीवन कारावास तक की है। भारत में बंधुआ मजदूर उन्मूलन अधिनियम, बाल श्रम अधिनियम और किशोर न्याय अधिनियम, बंधुआ और जबरन मजदूरी को रोकते हैं।

दिसंबर 2012 में हुए जघन्य बलात्कार मामले में सरकार ने एक विधेयक पारित किया जिससे यौन हिंसा और सेक्स के अवैध कारोबार से जुड़े कानूनों में बदलाव हो सके। लेकिन अब भी इन कानूनों के बनने और लागू होने में बड़ा अंतर है। हर तरफ फैले भ्रष्टाचार और रिश्वत के कारण इन एजेंटों का लड़के और लड़कियां को बेचना आसान है। लेकिन इन लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की जरुरत है जिससे इस समस्या को खत्म किया जा सके।

साथ ही लोगों को उनके इलाके में अच्छी शिक्षा और बेहतर सुविधाएं देने की जरुरत है, जिससे मां बाप अपने बच्चों को इस तरह ना बेच सकें। इसके साथ ही लड़कियों और महिलाओं के प्रति नजरिया बदलने की भी जरुरत है।

 

कपिल बिल्लोरे

(भोपाल )

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